साँझ ढले पंछी खो जाते

साँझ ढले पंछी खो जाते

अलग अलग दिशाओं में उड़ते

अपने झुंड से अलग हो जाते ,

पहुँचते घोंसलो तक फिर भी
सुबह फिर निकल जाते ।
मैं भी खोया हूँ इस साँझ तले
ढूँढता उन दिशाओं को
फिर भी पहुँचता तो मैं भी हूँ
होती सुबह फिर से
सूर्य का कर स्वागत निकलता तो हूँ।
पर दिन के बाद होती साँझ पुनः
फिर परिंदे हैं खो जा जाते
खो जाती दिशाएँ सभी पुनः
पंछी फिर अलग थलग उड़ जाते ।
मेरी भी कहानी ऐसी ही तो है
दिन के पश्चात साँझ ही तो है
नयी आस जगाता दिन ही तो है,
कर्म में अपने मैं भी लग जाता हूँ
फिर से साँझ हो जाती है
संख ध्वनियों से जागती रात है
घर पहुँचता
आस लगाए मैं सो जाता हूँ।
फिर उठूँगा फिर चलूँगा
फिर करूँगा कर्म पुनः
सीख यही मिलती है पंछी से
साँझ ढलते ही
जैसे वो खो जाता है
पुनः सूर्या उदय पर अग्रसर
वो हो जाता है ।

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