कई लम्हे इस तरह

समय लाया है कई लम्हे इस तरह

सांसे कभी जाती कभी आतीं जिस तरह,

ये कशमकश जिदंगी से पहचान बनाती ऐसे

हो रहा प्रारम्भ मनचाही उडान का इस तरह।

ले हाथों में हाथ उडे ही थे प्रारभद की ओर

की सामने से आता तूफान देख रूके किसी तरह,

हुआ अंधेरा कड़कती बिजलियाँ चहूं ओर

ले शरण बैठ जला रहे लकडियां

कर रहे उजाला ढाढस बंधा रहे कुछ इस तरह,

नरभक्षी बैठे हैं ताक में पता है मुझे,

उनसे बचना किस तरह पता है मुझे,

भोर बस होने को है शंखनाद सुनता हूँ मै

फिर उठेंगे और उडेंगे बादलों के बीच,

आएगा सवेरा और चहचहाऐंगे पंछी

नारायण का नाम ले प्रारम्भ होगी

शुभ यात्रा हमारी इस तरह।

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