बहक कर निकले

बेपरवाह मौसम करता है रुसवा जमाने को कर निकले शमा रौशन जैसे पूरे मैखाने को, अलग अलग इंतज़ाम लिए हर मय जैसे तासीर अपनी बैठे हैं सब मौसमों में खोए हुए लिए तक़दीर अपनी, जैसे किसी परिंदे के बच्चों के पर और वो उड़ निकलें जाएँ इनकी रुहानियत को सैय्यद फिर मसल निकलें, बस में … Continue reading बहक कर निकले

जब चौथे आयाम से देखा

ज़िंदा थे पर तस्वीरों में पहुँचते देखे कुछ तस्वीरें भी ज़िंदा होती देखीं, कुछ को चलन निभाते देखा कुछ को चलन सिखाते देखा, उलझे हुए को खुश देखा सुखी को उलझते देखा, जो ज़िंदा हैं उन्हे प्रयाग में देखा प्रयाग में कुछ को ज़िंदा होते देखा, IIM पास को नागा बनते देखा नागा को सदा … Continue reading जब चौथे आयाम से देखा