पायदान

पायदान के बाहर पैर रख कर मुफलिसी के दौर मे दस्तवर खान बिछा कर हम निवाला है बनाते हम उन खुदगरजों को जो आँखे दिखायें आस्तीनो को चढा कर। ------------ हमारी मुस्कुराहट देख कमज़ोरी ना समझाना दिखा आँखें हमे, खुदी है तुम्हारी बुलंद ना समझाना क्योंकि बड़ी हैसियत वाले नर्म मिज़ाज़ रहते हैं उबलते माहोल … Continue reading पायदान

जीता रहा इंसान

Not my poetry.. Anonymous writer उल्हजहनोँ मेँ उल्हज कर जीता रहा इंसान जीने का सलीखा अंततक कभी सीखा नहीं उम्रभर अंधेरों से ही सदाँ लड़ता रहा इंसान जलता चिराग हाथ मेँ लेकर कभी चला नहीं अकेला होगया है आदमीं ढूनियां की भीड मेँ ऊजाला कभी करता नहीं खुद की ही नीड मेँ उम्र भर वह … Continue reading जीता रहा इंसान