हे पिता

हे पिता!

तुम्हारी सीख का घ्यान धर

विचरता हूँ,

तुम्हारी छवी का

अनुसरण करता चलता हूँ,

उंगली पकड़े तुम्हारी अभी तक

खड़े हैं हम,

हमारी संस्कृति

और सभ्यता तुमसे है

तुम हो गुरू

तुम्हारी सीख पर चलता हूँ।

हे पिता!

तुम्हे प्रणाम कर

अग्रसर होता हूँ,

कर्म कर

तुम्हारी प्रशंसा की

उपेक्षा करते हैं,

सौम्य स्वभाव

मुख प्रसन्नचित

धीरज धरे खडे़ अडिग

प्रशंसा कर हमारी

मार्ग दर्शन करते हो।

हे पिता!

शत-शत कोटि-कोटि

प्रणाम करता हूँ

तुम्हे नमन कर

पुनः ध्यान धरता हूँ

सदैव स्वस्थ रहो

ऐसा व्रत करता हूँ

तुम्हारी हर सीख को

बार बार बयान करता हूँ।

Love you dad…

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