🙏🌹जय द्वारकाधीश🌹🙏

🦚🦚🦚🦚🦚
सुदामा के चावलों में
दखल न थी- प्रेम था
मालिनी कुब्जा की कोई
शक्ल न थी- प्रेम था
धन्ना की पूजा में कोई
अक्ल न थी -प्रेम था
मीरा के कीर्तन में कोई
नकल न थी-प्रेम था
कौन से हीरे जड़े थे
नरसी की खड़ताल में
क्या बांधकर लाया था
निर्धन ,फ़टे हुए रुमाल में
वन में जाकर भी खाया
द्रौपदी के थाल में
नित नित माखन लुटा
गोपियों के जाल में
जिसके जूठे बेर खाए
उसकी क्या बिसात थी
विदुरानी के छिलकों में
भी ,प्रेम की ही तो बात थी

Leave a Reply