यह चिता नहीं यह काया थी

यह चिता नहीं यह काया थी
जो भस्म हुई बस माया थी
मोह मिथ्या का उचाट यही है
मणिकर्णिका का घाट यही है..

यहीं चिता में इच्छा सोती है
यहीं दीप्त आत्मा होती है
जब सौभाग्य तुझे बुलाएगा
देखना तू भी काशी आएगा..

पापों का बोझ निगलती है
यह शुद्ध अनामय करती है
अग्नि का स्पर्श जैसे पारस
गंगा और ये शहर बनारस..

इच्छा केवल एक करूँ मैं
मरना जब हो यहीं मरूँ मैं
गंगा किनारे पड़ी हो जो
उसी राख का ढेर बनूँ मैं..

भ्रमजाल सभी हट जाएंगे
इस नगरी में मिट जाएंगे
फिर बयार मोक्ष की आएगी
अस्तित्व अमर कर जाएगी..

सनातन मैं कहलाऊँगा
अविरल मैं रह जाऊँगा
वेग मेरा अटल रहेगा
मैं गंगा में बह जाऊँगा …

तट पर सजे हैं पुंज भस्म के
जैसे शिव का ललाट यही है
मणिकर्णिका का घाट यही है
मणिकर्णिका का घाट यही है.!!

हर-हर महादेव 🚩
जय मोक्ष नगरी काशी 🙏

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