पाय गयो रघुवीर

मन शीतल जल भया पाय गयो रघुवीर, मूढ़ बनत फिरता रहा जब जपा नाम रघुवीर, दस कंधर ज्ञानी हुआ खुद चले आए रघुवीर, दस सिर जानत अवगुण थे मिटावे पीढ रघुवीर, परम सत्य को जानिए अंतर्मन जब होए अधीर , अवगुण जान स्वयं के चरण शरण जाओ रघुवीर।

चिन्तन चित्त को चाहिए

चिन्तन चित्त को चाहिए तनको चाही नीर, मन को भौतिक सुख की इच्छा आत्मा बने फ़क़ीर । क़हत पुलसत्य सुनो भाई साधों बन रहे बड़े बड़े फ़क़ीर , भजन पूजन से कछु मिले नहीं ना हो भाव फ़क़ीर । खुदा कहो या शिव होते वही क़रीब , जो जन सेवा करे बनावे नाहीं लकीर ।