बिलइया लै गई

“ऊंट बिलैया ले गई सो हांजू- हांजू कइये बुंदेली के महान कवि श्री जगन्नाथ सुमन, तहसील मउरानीपुर के पास स्थित पचवारा गांव के निवासी थे। उनकी यह रचना आज के परिवेश पर बुंदेली मे कलात्मक व्यंग्य है।कविता की पहली लाइन का अर्थ है –बड़ा आदमी या आपका अफसर कुछ भी कहे, आप बस उसकी चमचागिरी … Continue reading बिलइया लै गई

तुम्हारी हर बात अनोखी है

आज जब जनम दिन तुम्हारा है हर याद तुम्हारी ताज़ा है बिताए जो साल तुम्हारे साथ वो सभी पल ताज़ा हैं । बच्चे तुम्हारे यहीं पास हैं वो दोनो ही मेरे कुछ ख़ास हैं दिखता है अभी तुम शांत नहीं हवाओं में भी कुछ ख़ास है । चिंता छोड़ो तुम मेरे बड़े भाई आख़री दिन … Continue reading तुम्हारी हर बात अनोखी है

चैतन्य उसका नाम

रावण रहे ना राम, जग में बसे हैं सिर्फ़ नाम नाम की माया बड़ी, चलता रहे सब काम रावण जीता जग तब, करी सुनहरी लंका नाम राम भटके १४ बरस, तब पहुँचाए निज धाम कहानी सुन सुन तुम बढ़ रहे, कहाँ से आए ये ज्ञान चाहे पढ़ो रहीम चाहे पढ़ो चरित्र नाम “ राम “ … Continue reading चैतन्य उसका नाम

रास्ते यूँही आसान मिल जाते

रास्ते कभी सीधे कभी टेढ़े हो जाते , हम यूँही हैरान कभी परेशान हो जाते, सोचते मंज़िल तक पहुँचने को रास्ते यूँही आसान मिल जाते , कभी छाँव कभी कड़ी धूप के नज़ारे मिल जाते , सोचते मंज़िल तक पहुँचने को रास्ते यूँही आसान मिल जाते , कभी शरीर सुख भोगता कभी दिल में दर्द … Continue reading रास्ते यूँही आसान मिल जाते

उन्हें इल्म नहीं

दिन दूनी रात चौगुनी तरक़्क़ी जो किया करते हैं उन्हें इल्म नहीं उस जज़्बात का जिससे सीने ठंडे हुआ करते हैं , कुछ बर्दाश्त करने की आदत जो डाली होती पुलस्त्य जाना होता की अपनो की ख़्वाहिशों से ज़्यादा उनकी मुस्कुराहट के मायने हुआ करते है । तुम बैठ जाओ बस इस खुदा के कमाल … Continue reading उन्हें इल्म नहीं

रुकना चलना

रुकना चलना, जीवन का सुख।लेना- देना अनुभव निज सुख। नित परिवर्तन प्रकृति भाव है।परवश जीवन कभी नहीं सुख। मेघों का अपना जीवन है।उठना, चलना और बरसना । पर वे परवश, नहीं बरसते।जब तक शीतलता से उन्मुख। जल जीवन आसान नहीं है,नहीं सरल हैं उनके रस्ते। पर्वत से गिर मैदानों में,चलते रहते बेकल, बेसुध। जब वे … Continue reading रुकना चलना

गृहस्थी

अपनी गृहस्थी को कुछ इस तरह बचा लियाकभी आँखें दिखा दी कभी सर झुका लिया आपसी नाराज़गी को लम्बा चलने ही न दियाकभी वो हंस पड़े कभी हमने मुस्करा दिया रूठ कर बैठे रहने से घर भला कहाँ चलते हैंकभी उन्होंने गुदगुदा दिया कभी मैंने मना लिया खाने पीने पे विवाद कभी होने ही न … Continue reading गृहस्थी

मै से मै तक की ये दूरी

मै से मै तक की ये दूरी वादों क़समों की मजबूरी , अपनो से प्रतिस्पर्धा भी है ज़रूरी सत्यापन से डरने की मेरी मजबूरी , माया है ये कि मोह है मै से मै तक की ये दूरी । “मै” से अहंकार का जन्म होना फिर इस दौड़ में शामिल होना दुख पैदा कर दूसरों … Continue reading मै से मै तक की ये दूरी