बहक कर निकले

बेपरवाह मौसम करता है रुसवा जमाने को कर निकले शमा रौशन जैसे पूरे मैखाने को, अलग अलग इंतज़ाम लिए हर मय जैसे तासीर अपनी बैठे हैं सब मौसमों में खोए हुए लिए तक़दीर अपनी, जैसे किसी परिंदे के बच्चों के पर और वो उड़ निकलें जाएँ इनकी रुहानियत को सैय्यद फिर मसल निकलें, बस में … Continue reading बहक कर निकले

तुम्हारी ज़रा-नवाज़ी के क़ायल हुए हम ऐसे

तुम्हारी ज़रा-नवाज़ी के क़ायल हुए ऐसे जैसे बर्फ़ किसी मय में मिल पिघले । आए थे तेरे कूचे पर बेख़बर यूँ तो जैसे खुदा की तलाश में जोगी चल निकले । थाम कर हाथ बैठा दिया मैखाने में यूँ जैसे मय की तासीर को परख हल निकले। एक शोख़ शमा इधर जलने को है और … Continue reading तुम्हारी ज़रा-नवाज़ी के क़ायल हुए हम ऐसे

कहाँ है वो जगह जहाँ सुकून-ए-जहाँ मिलते हैं

कहाँ है वो जगह जहाँ सुकून-ए-जहाँ मिलते हैं दिखाते सभी वो मंज़र, जहाँ सभी मसरूफ मिलते है । हम भी निकले हैं उस गुरु की खोज में कहते हैं शरण में उसकी, खुदा मिलते हैं । पहुँचा हूँ मैखाने में अभी, ना समझना मुझे शराबी यहाँ दिल से निकले आँसूओं के, हिसाब मिलते है । … Continue reading कहाँ है वो जगह जहाँ सुकून-ए-जहाँ मिलते हैं

पहलू में

वक्त गुजरता है, लम्हे चले जाते कशमकश के पहलू में शाम हो जाती है, मंजर चले जाते उदासी के पहलू में। बैठे ताक रहे थे खिड़की से बाहर अंधेरों को चांदनी नजर आयी दूर वादियों के पहलू में। कुछ मुस्कुराहट सी आयी लबों पर हमारे जैसे एक आग समाई हो सैलाब के पहलू में। खिंचाव … Continue reading पहलू में

महफ़िल-ए-जाँबाज़ को देख मुस्कुरा कर चल दिए

Dedicated  to all soldiers महफ़िल-ए-जाँबाज़ को देख मुस्कुरा कर चल दिए, वो बैठे थे नूर-ए-जंग की कामयाबी की मिसाल दिए। उस जाँबाज़ के अपनो के आँसुओं को देख रो पड़े छाती उनकी चौड़ी थी आँखों में आँसुओं को लिए । एक नादान भी था माँ की अगोश में छिपा हुआ नज़रें तलाशतीं जाँबाज़ को उसकी, … Continue reading महफ़िल-ए-जाँबाज़ को देख मुस्कुरा कर चल दिए

वक़्त करवट बदलता है आवाज़ नहीं होती

वक़्त करवट बदलता है आवाज़ नहीं होती, वो आग़ाज़ करता है तो आवाज़ नहीं होती । हम झेलते हुए मार वक़्त की ताक़त को देखते हैं वक़्त जब ना हो साथ ज़ोर-ए-परवाज़ नहीं होती। हमने रखा था हम-परवाज़ वक़्त को हार कर वक़्त के साथ इज़ं-ए-परवाज़ की आवाज़ नहीं होती । तय्यार रहना हमारी आदत … Continue reading वक़्त करवट बदलता है आवाज़ नहीं होती

कुछ जान-ए-जिगर साथ है

कुछ जान-ए-जिगर साथ है, कुछ नए जज़्बात साथ है। मेरे हमनवाज हमसफ़र साथ हैं, मुस्कुराहटों में निकल रहे लम्हे साथ हैं। इन लमहों में सिमटे कुछ लम्हे साथ हैं, बंद आँखों में निकले नमकीन अश्क़ साथ हैं। तुम्हारी इस ज़रा-नवाजी से शुक्रगुज़ार  हुए सन्यासी के ये जज़्बात साथ हैं।

वक़्त से रुसवा हो ऐसे चले थे कि बेपरवाह हो गए

वक़्त से रुसवा हो ऐसे चले थे कि बेपरवाह हो गए , उसने जाने अनजाने याद रखा और ख़ैरखवाह हो गए। बेरुख़ी समझी हमने परवरदेगार की सन्यासी हो गए, खरखवाहों में रह कर भी बेमुराव्वत लापरवाह हो गए। कुछ जुनून तो है नौजवान-ए-हिंद में कर गुज़रने को, ज़लज़ले से निकली लहरों में खड़े बंदरगाह हो गए … Continue reading वक़्त से रुसवा हो ऐसे चले थे कि बेपरवाह हो गए

बेख़बर इंसान से ये पूछो की कैसे

बेख़बर इंसान से ये पूछो की कैसे करे इतना अभिमान चढ़ेगा सूली पर कैसे । उसने इसे बनाया क्या सोच कर बनेगा मेरा प्रतिबिंब चढ़ेगा सूली पर कैसे। दशों दिशाओं का ज्ञानी हो कर भी रावण लाया सीता को हर , चढ़ेगा सूली पर कैसे । था बस सूली पर चढ़ना ईसा के ही बस … Continue reading बेख़बर इंसान से ये पूछो की कैसे